दिल्ली में हाल ही हुई धमाकों की घटनाओं के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य में सुरक्षा बढ़ाने के लिए नया प्रोटोकॉल लागू किया है। इसके तहत अब सभी मान्यता प्राप्त और गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों को अपने मौलाना, शिक्षक और छात्रों का विस्तृत व्यक्तिगत विवरण एंटी-टेरेरिस्ट स्क्वॉड (ATS) को सौंपना अनिवार्य होगा।
सरकारी आदेश में शिक्षकों और छात्रों का मोबाइल नंबर, स्थायी पता, आधार कार्ड और अन्य पहचान दस्तावेज शामिल हैं। इसके अलावा, मदरसों को अपने प्रबंधन और संचालन से जुड़े प्रमुख व्यक्तियों की जानकारी भी ATS को उपलब्ध करानी होगी।
सरकारी सूत्रों का कहना है कि यह प्रक्रिया केवल डेटा संग्रह नहीं, बल्कि सुरक्षा ऑडिट का हिस्सा है। इसका उद्देश्य समय रहते किसी भी संस्थान में संदिग्ध गतिविधियों या तत्वों की पहचान करना है। पिछले कुछ महीनों में कुछ मदरसों और प्राइवेट धार्मिक संस्थानों में बाहरी राज्यों के युवाओं की बढ़ती आवाजाही को लेकर सुरक्षा एजेंसियां सतर्क रही हैं।
उत्तर प्रदेश के आठ जिलों — प्रयागराज, प्रतापगढ़, कौशांबी, फतेहपुर, बांदा, हमीरपुर, चित्रकूट और महोबा — के मदरसों से विस्तृत विवरण तलब किया गया है। फतेहपुर जिले में यह अभियान पहले ही शुरू हो चुका है, जहां मदरसों को अध्यापकों, छात्रों और उनके अभिभावकों की जानकारी जमा करने का निर्देश दिया गया है।
सिर्फ मदरसे ही नहीं, कुछ निजी विश्वविद्यालयों को भी जांच के दायरे में लाया गया है। लखनऊ की इंटीग्रल यूनिवर्सिटी में हाल ही में दिल्ली धमाके से जुड़े एक शिक्षक का नाम सामने आने के बाद खुफिया एजेंसियों ने निर्देश दिए हैं कि जम्मू‑कश्मीर और अन्य राज्यों से आने वाले सभी प्रोफेसरों और छात्रों का रिकॉर्ड उपलब्ध कराया जाए। इसमें विदेशी छात्रों की संख्या, पाठ्यक्रम और उनकी भूमिकाओं का विवरण भी शामिल है।
सरकारी अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि यह कदम किसी विशेष संस्था या समुदाय के खिलाफ नहीं है, बल्कि सुरक्षा को प्राथमिकता देने की नीति का हिस्सा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस कदम से धार्मिक और शैक्षणिक संस्थानों में सुरक्षा की स्थिति मजबूत होगी, लेकिन नागरिकों की निजता और संस्थागत स्वतंत्रता को लेकर बहस भी छिड़ सकती है।
उत्तर प्रदेश में सुरक्षा एजेंसियों की यह नई रणनीति, राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय सुरक्षा नेटवर्क को और मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है।