लोकसभा में संविधान (एक सौ इकतीसवां संशोधन) विधेयक, 2026 की पराजय को सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया ने भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ करार दिया है। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव मुहम्मद अशरफ ने इसे संघवाद, सामाजिक न्याय और संवैधानिक संतुलन की दिशा में एक निर्णायक जीत बताया है।
अपने विस्तृत बयान में अशरफ ने कहा कि SDPI महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की पुरजोर समर्थक रही है, लेकिन इस महत्वपूर्ण मुद्दे को परिसीमन और लोकसभा सीटों की संख्या को बढ़ाकर 850 करने जैसे व्यापक चुनावी पुनर्गठन से जोड़ना गंभीर चिंताओं को जन्म देता है। उनके अनुसार, यह कदम न केवल नीति-निर्माण की प्राथमिकताओं को भ्रमित करता है, बल्कि इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भी प्रश्नचिह्न लगते हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि इस विधेयक का समय संयोग नहीं, बल्कि आगामी चुनावों से पहले राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित करने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है। अशरफ ने कहा कि वास्तविक लोकतांत्रिक सुधारों के लिए पारदर्शिता, व्यापक सहमति और सामाजिक प्रतिनिधित्व की गारंटी आवश्यक है, जो इस प्रस्ताव में स्पष्ट रूप से अनुपस्थित थी।
विधेयक के प्रावधानों पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि 2011 की जनगणना के पुराने आंकड़ों के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण करना और उसे महिलाओं के आरक्षण से जोड़ना न केवल जल्दबाजी भरा कदम है, बल्कि इससे सामाजिक न्याय की अवधारणा भी कमजोर होती है। उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि बिना व्यापक जातीय जनगणना के ऐसे निर्णय लेने से अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और धार्मिक अल्पसंख्यकों की महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
SDPI ने यह भी रेखांकित किया कि प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया भारत के संघीय ढांचे को असंतुलित कर सकती थी। जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में अपेक्षाकृत सफलता हासिल की है, उनके मुकाबले अधिक जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों को असमान रूप से लाभ मिलने की आशंका थी। पार्टी के अनुसार, इस तरह का असंतुलन न केवल राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व के संतुलन को बिगाड़ता, बल्कि राष्ट्रीय एकता पर भी दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकता था।
अशरफ ने यह भी कहा कि इतने महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधन से पहले राज्य सरकारों, राजनीतिक दलों और अन्य हितधारकों के साथ व्यापक और सार्थक संवाद का अभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि लोकतंत्र में सहमति-आधारित सुधार ही टिकाऊ और प्रभावी होते हैं।
पार्टी ने दोहराया कि महिलाओं का आरक्षण एक स्वतंत्र और प्राथमिक सुधार के रूप में लागू किया जाना चाहिए, न कि इसे व्यापक चुनावी पुनर्गठन के औजार के रूप में इस्तेमाल किया जाए। SDPI का मानना है कि वास्तविक लैंगिक न्याय तभी संभव है, जब नीतियां समावेशी, पारदर्शी और वंचित वर्गों के हितों को केंद्र में रखकर बनाई जाएं।
SDPI ने सरकार से अपील की कि भविष्य में किसी भी संवैधानिक बदलाव से पहले संविधान की मूल संरचना को अक्षुण्ण रखते हुए संघीय मूल्यों की रक्षा की जाए और एक पारदर्शी, समावेशी संवाद की प्रक्रिया अपनाई जाए। पार्टी ने यह भी स्पष्ट किया कि वह महिलाओं और सभी वंचित समुदायों के अधिकारों के लिए अपने संघर्ष को जारी रखेगी।
यह घटनाक्रम न केवल एक विधेयक की पराजय है, बल्कि यह संकेत भी है कि भारत में लोकतांत्रिक संस्थाएं और जनमत अब भी ऐसे कदमों के खिलाफ खड़े होने की क्षमता रखते हैं, जो सामाजिक न्याय और संघीय संतुलन को चुनौती देते हैं।
