वक़्फ़ संशोधित क़ानून मुस्लिम पहचान पर हमला: बिहार के 3900 मदरसों के अस्तित्व पर भी मंडराया खतरा-इमारत-ए-शरीया ने शुरू की संगठित मुहिम

इंसाफ़ टाइम्स डेस्क

अमीर-ए-शरीयत मौलाना अहमद वली फैसल रहमानी ने इमारते शरीया में प्रेस कॉन्फ्रेंस किया और कहा कि “वक़्फ़ संशोधन कानून को सिर्फ एक क़ानूनी बदलाव नहीं, बल्कि मुस्लिमों की धार्मिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक पहचान पर सीधा हमला है”, उन्होंने कहा कि “यह कानून हमारी आने वाली नस्लों से वक़्फ़ और उनके संवैधानिक व शरीयत आधारित अधिकार छीनने की एक गहरी साज़िश है”

पटना के फुलवारी शरीफ स्थित इमारत-ए-शरीया के मुख्य कार्यालय में आयोजित अहम प्रेस कॉन्फ्रेंस में अमीर-ए-शरीयत ने कहा “अगर यह कानून इसी रूप में लागू हुआ तो हमारी मस्जिदें, मदरसे, कब्रिस्तान, और वक़्फ़ की ज़मीन पर बने स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी और अन्य रिफाही संस्थान — सबकुछ खतरे में आ जाएंगे।”

चतुराई से चैरिटेबल ट्रस्ट को हटाना: 3900 मदरसों के लिए कानूनी संकट?

उन्होंने कहा कि “वक़्फ़ संशोधित कानून में बड़ी चतुराई से चैरिटेबल ट्रस्ट को वक़्फ़ की परिभाषा से बाहर कर दिया गया है,बिहार में लगभग 3900 मदरसे वक़्फ़ की ज़मीन पर बने हुए हैं और अधिकांश ट्रस्ट के तहत चल रहे हैं। इस कानून के मुताबिक ये अब वक़्फ़ रहेंगे या नहीं? इस पर कानून चुप है, और यही चुप्पी वक़्फ़ के अस्तित्व पर बड़ा सवाल खड़ा करती है।”

“मुसलमान दिखना” ज़रूरी? — अब सिर्फ ईमान नहीं, शक्ल भी जांची जाएगी!

अमीर-ए-शरीयत ने कहा कि “नए कानून में वाक़िफ (वक़्फ़ देने वाला) के मुसलमान होने के साथ-साथ “मुसलमान दिखने” की शर्त भी जोड़ दी गई है,यह न सिर्फ़ ग़ैर-मुस्लिमों को रोकने की कोशिश है, बल्कि खुद मुसलमानों को भी संदेह के घेरे में लाने की सोची-समझी साज़िश है।”

वक़्फ़ अलल-औलाद पर शक = रद्द? — शरीअत का अपमान!

उन्होंने कहा कि “अगर कोई भी व्यक्ति यह दावा कर दे कि वक़्फ़ अलल-औलाद (औलाद के लिए वक़्फ़) नहीं है, तो वह वक़्फ़ रद्द हो जाएगा — भले ही उस पर हज़ार गवाहियाँ हों,”यह शरीअत की तौहीन और इस्लामी विचारधारा के साथ खुला विरोध है।”

वक़्फ़ बाय यूज़र: सिर्फ दिखावा — टैक्स अधिकार एक और घाव!

उन्होंने कहा कि वक़्फ़ बाय यूज़र को कानून में शामिल ज़रूर किया गया है, लेकिन ऐसी शर्तों के साथ जो इसके अस्तित्व को ही संदिग्ध बना देती हैं।
“अगर ज़मीन ज़रा सी भी विवादित हो जाए या सरकार दावा कर दे, तो वह वक़्फ़ नहीं मानी जाएगी। यह सब वक़्फ़ के नाम पर धोखा है।”

साथ ही उन्होंने सवाल उठाया कि “सरकार को किसने हक़ दिया कि वह वक़्फ़ संपत्तियों पर मनमाना टैक्स लगाए? यह क़ौम की धार्मिक संपत्ति पर ज़ुल्म और एक और गहरा ज़ख्म है।”

*इमारत-ए-शरीया का ऐलान: वक़्फ़ की हिफाज़त के लिए आंदोलन होगा

प्रेस कॉन्फ्रेंस के अंत में मौलाना अहमद वली फैसल रहमानी ने देश के सभी संविधान-प्रिय नागरिकों से अपील की कि वे इस कानून के खिलाफ लोकतांत्रिक और संवैधानिक दायरे में रहकर मज़बूत आवाज़ उठाएं।
“इमारत-ए-शरीया क़ौम के साथ खड़ी है और वक़्फ़ की हिफाज़त की यह जंग आखिरी सांस तक जारी रहेगी।”

अंत में उन्होंने मुसलमानों से पुरजोर अपील की:
“यह वक्त ग़फ़लत का नहीं, जागरूकता और जद्दोजहद का है। अगर आज हम खामोश रहे, तो कल हमारी तारीख़, हमारी ज़मीन और हमारी पहचान सिर्फ़ किताबों में रह जाएगी।”

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