“वर्धा विश्वविद्यालय में छात्रों की बड़ी न्यायिक जीत: उच्च न्यायालय ने अवैध निष्कासन और निलंबन रद्द किया”

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय (एमजीएएचयू), वर्धा में वर्ष 2024 में पांच छात्रों के अवैध निष्कासन और निलंबन का विवाद अब खत्म हो गया है। बॉम्बे उच्च न्यायालय, नागपुर खंडपीठ के आदेश के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्रों का निष्कासन और निलंबन रद्द कर दिया। यह छात्र आंदोलन की बड़ी न्यायिक जीत मानी जा रही है।

27 जनवरी 2024 को विश्वविद्यालय प्रशासन ने डॉ. रजनीश कुमार आंबेडकर (डिप्लोमा), रामचंद्र (शोधार्थी), राजेश कुमार यादव (शोधार्थी), निरंजन कुमार (शोधार्थी) और विवेक मिश्रा (स्नातक छात्र) को बिना औपचारिक जांच और बिना पक्ष सुने निष्कासित/निलंबित कर दिया था। यह कार्रवाई उस छात्र प्रदर्शन के बाद की गई थी जिसमें तत्कालीन कार्यवाहक कुलपति की कथित अवैध नियुक्ति को लेकर असहमति जताई गई थी।

निरंजन कुमार और विवेक मिश्रा ने तत्काल बॉम्बे उच्च न्यायालय में याचिका दायर की, जिससे उन्हें राहत मिली। वहीं, राजेश कुमार यादव और रामचंद्र को वित्तीय संसाधनों की कमी के कारण न्यायालय पहुँचने में समय लगा। उन्होंने नवंबर 2024 में अधिवक्ता निहाल सिंह राठौर के माध्यम से याचिका दायर की। सुनवाई लगभग एक वर्ष तक चली।

19 दिसंबर 2025 को उच्च न्यायालय ने विश्वविद्यालय प्रशासन को चेतावनी दी कि यदि अवैध निष्कासन और निलंबन वापस नहीं लिया गया, तो अदालत सख्त आदेश पारित करेगी। इसके बाद सोमवार को विश्वविद्यालय प्रशासन ने दोनों छात्रों का निष्कासन एवं निलंबन वापस लेने का शपथ पत्र दाखिल किया। 22 दिसंबर 2025 को न्यायालय ने आदेश पारित कर इसे मान्यता दी।

राजेश कुमार यादव ने कहा कि यह लड़ाई केवल व्यक्तिगत जीत नहीं, बल्कि दलित-बहुजन छात्रों की आवाज दबाने की संस्थागत साजिश के खिलाफ भी है। रामचंद्र ने कहा कि विश्वविद्यालय अब प्रशासनिक भ्रष्टाचार और तानाशाही का गढ़ बन चुका है, लेकिन छात्र लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रखेंगे।

एमजीएएचयू में पिछले वर्षों में प्रशासनिक अनियमितताओं, शिक्षक नियुक्तियों में धांधली, वित्तीय अनियमितताओं और प्रवेश प्रक्रियाओं में देरी जैसे मुद्दे सामने आते रहे हैं। छात्रों का आरोप है कि विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा लोकतांत्रिक प्रक्रिया और संवैधानिक अधिकारों की अनदेखी की जा रही है।

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