मद्रास हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस G.R. स्वामीनाथन ने कहा है कि अपने बचे हुए चार ढाई साल के कार्यकाल के दौरान वे “सनातन धर्म को अपने दिल में रखकर” न्यायिक सेवा करेंगे। इस बयान ने सामाजिक और राजनीतिक विवाद को तेज कर दिया है।
शनिवार को दारा फाउंडेशन द्वारा चेन्नई में आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए न्यायाधीश ने कहा कि केवल पेशेवर ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि नैतिक मूल्यों और सेवा की भावना भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि समारोह में सम्मानित लोगों में सेवा और विनम्रता के भाव स्पष्ट रूप से दिखाई दिए।
जस्टिस स्वामीनाथन ने कहा, “मुझे उम्मीद है कि मेरे पास चार और ढाई साल की सेवा है। इन चार ढाई सालों में मुझे उत्कृष्टता दिखानी है और सनातन धर्म को अपने दिल में रखना है।”
हालांकि, उनके इस बयान को लेकर राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों में तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं। विपक्षी दलों का कहना है कि संविधान के अनुसार न्यायपालिका को धर्मनिरपेक्ष रहना चाहिए और किसी भी धार्मिक विचारधारा को अपने कार्य का मार्गदर्शन नहीं बनाना चाहिए। कुछ नेताओं ने इसे संविधान और न्यायिक तटस्थता के विरोध में बताया है।
बता दें कि जस्टिस स्वामीनाथन पहले भी विवादों में रहे हैं। उनके कुछ फैसलों और सार्वजनिक टिप्पणियों के कारण विपक्षी दलों ने उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की कोशिश की थी, जिसमें आरोप लगाया गया कि उन्होंने कुछ मामलों में सांप्रदायिक रुचियों का पक्ष लिया।
उनके इस बयान के बाद बहस फिर से शुरू हो गई है कि क्या संवैधानिक पद पर बैठे न्यायाधीश को सार्वजनिक भाषण में धार्मिक शब्दावली का इस्तेमाल करना उचित है या नहीं, खासकर जब भारत का संविधान धर्मनिरपेक्षता का स्पष्ट समर्थन करता है। इस मुद्दे पर अब विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक और कानूनी पक्षों से प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं।