सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) ने गृह मंत्रालय के उस निर्देश का कड़ा विरोध किया है, जिसमें आधिकारिक समारोहों, राष्ट्रपति और राज्यपाल से जुड़े कार्यक्रमों तथा विद्यालयी सभाओं में वंदे मातरम् के सभी छह पदों को अनिवार्य रूप से गाने की बात कही गई है। पार्टी ने इसे देश के धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक ढांचे पर सीधा आघात बताया है।
SDPI के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सीताराम खोईवाल ने जारी बयान में कहा कि यह निर्णय 1937 में दिखाई गई ऐतिहासिक समझदारी की अनदेखी करता है, जब स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने विचार-विमर्श के बाद गीत के केवल पहले दो पदों को अपनाया था, ताकि राष्ट्रीय गीत सभी समुदायों के लिए स्वीकार्य और समावेशी बना रहे।
उन्होंने कहा कि गीत के बाद के पदों में दुर्गा और लक्ष्मी जैसे हिंदू देवी-देवताओं के उल्लेख तथा मंदिर संबंधी प्रतीकों का वर्णन है, जिसे कई नागरिक, विशेषकर अल्पसंख्यक समुदायों के लोग, अपने धार्मिक विश्वासों के अनुरूप नहीं मानते। ऐसे में पूरे गीत को अनिवार्य करना और सभी उपस्थित लोगों के लिए खड़ा होना बाध्यकारी बनाना, धर्म और अंतरात्मा की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।
खोईवाल ने कहा कि भारत जैसे बहुलतावादी समाज में किसी भी नागरिक को ऐसे अनुष्ठान में भाग लेने के लिए विवश नहीं किया जाना चाहिए, जो उसके व्यक्तिगत विश्वासों से टकराता हो। उन्होंने विशेष रूप से विद्यालयों का उल्लेख करते हुए कहा कि शिक्षा संस्थानों को एकता और सीखने का केंद्र होना चाहिए, न कि असहजता और विभाजन का।
SDPI नेता ने आरोप लगाया कि यह कदम देशभक्ति का विषय नहीं, बल्कि “बहुसंख्यक सांस्कृतिक आख्यान” थोपने और अल्पसंख्यकों की निष्ठा की परीक्षा लेने की एक राजनीतिक पहल है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान स्वैच्छिक सहभागिता और संवाद से विकसित होता है, न कि दंड के भय या सामाजिक दबाव से।
पार्टी ने केंद्र सरकार से इस निर्देश को तत्काल वापस लेने की मांग की है। बयान में कहा गया कि भारत की असली ताकत उसकी विविधता में है, न कि थोपे गए एकरूपता में। SDPI ने स्पष्ट किया कि वह गणराज्य के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को कमजोर करने के किसी भी प्रयास का विरोध जारी रखेगी और समावेशी भारत के पक्ष में खड़ी रहेगी।